चन्द्र सिंह राही- लोकगायक

महान लोकगायक श्री  चन्द्र सिंह राही का जन्म पौड़ी के गिंवाली गाँव में 28 मार्च 1942 को हुआ था। राही जी ने संगीत की शिक्षा विरासत से प्राप्त की और अपनी उस अनमोल विरासत को बखूबी संभाला। गरीब परिवार में जन्मे चन्द्र सिंह राही दो भाई थे। दिवंगत राही जी उत्तराखंड के ऐसे संगीतज्ञ थे जो हर दुर्लभ लोकवाद्य यंत्रों के जानकार थे। उन्होंने प्रदेश की कोस-कोस पर बदलने वाले लोकसंगीत पर काफी शोध किया था। चंद्र सिंह राही को उनके पिता दिलबर सिंह ने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा दी थी। उनका मानना था कि वो पहाड़ी लोगों के लिए ऐसे गीत बनाएं, जिसे लोग कभी भी भूल ना पाएं और राही जी ने ऐसा किया भी। अपने दौर में उन्होंने सभी नामी-गिरामी साहित्यकारों, कलाकारों के साथ काम किया। उनके पास लोकगीतों का खजाना था। उन्होंने खुद भी गीत लिखे और उनको गाया। लोक वाद्यों को बजाने में भी उनको महारत थी। डौर, हुड़की, ढोल, दमाऊँ, शिणै को वे बड़ी कुशलता से बजा लेते थे।

पौड़ी में संगीत सीखने के बाद चन्द्र सिंह राही दिल्ली आकर रहने लगे। दिल्ली में उन्होंने सांस्कृतिक क्रियाकलापों में भाग लिया और वहां पर होने वाले कई सांस्कृतिक क्रियाकलाप का हिस्सा बने। इसी के साथ उन्होंने गढ़वाली में बनने वाली फिल्मों के लिए भी काम किया। काफी समय के बाद उन्हें बड़ा काम मिला और फिर उन्हें दूरदर्शन के लिए फिल्में बनाने का मौका मिला। ये उनके​ लिए काफी बड़ा मौका था। ​दूरदर्शन में फिल्में बनाने के बाद उन्होंने आकाशवाणी के लिए गाया। चन्द्र सिंह राही हमेशा मजदूर, गरीब, उपेक्षित और शोषित लोगों के हितों के लिए समर्पित रहे। वो चाहते थे कि उनका पूरा जीवन उत्तराख्ंड के लिए काम करने में बीत जाए। विचारों में वे उत्तरकाशी के कॉमरेड कमला राम नौटियाल के साथ भी जुड़े रहे और गले में हारमोनियम डाले मजदूरों की चेतना जगाने वाले गीत गाते हुए उनके साथ काफी घूमे थे।

स्व. चन्द्रसिंह ‘राही’ का मतलब था, सभी लोक विधाओं का एक साथ चलना। उनको समझना। उस अन्र्तदृष्टि को भी जो लोक के भीतर समायी है। वे लोक विधाओं का एक चलता-फिरता ज्ञानकोश थे। वे लोक धुनों के धनी थे। प्रकृति प्रदत्त आवाज के बादशाह भी। उनके गीतों में प्रकृति का माधुर्य है।

राही जी के बहुत सारे गीत थे। कुमाउनी और गढ़वाली में। कुछ गीत आज भी कानों में उसी तरह गूंजते हैं। ‘छाना बिलोरी झन दिया बोज्यू, लागनी बिलोरी का घामा…’, ‘गरुडा भरती कौसानी ट्रेनिंगा, देशा का लिजिया लडैं में मरुला…’, ‘बाटि लागी बराता चेली भैट डोलिमा…’, ‘सरग तरा जुनाली राता, को सुणलो तेरी-मेरी बाता…’, ‘काली गंगा को कालो पाणी…’, ‘हिल मा चांदी को बटना…’, ‘रणहाटा नि जाण गजै सिंहा…’, ‘मेरी चदरी छूटि पछिना…,’ ‘रामगंगा तरै दे भागी, धुरफाटा मैं आपफी तरूलों…,’ ‘पार का भिड़ा कौ छै घस्यारी…’, ‘कमला की बोई बना दे रोटी, मेरी गाड़ी ल्हे गै छ पीपलाकोटी…’, ‘पारे भिड़ै की बंसती छोरी रूमा-झुम…’, ‘ओ परुआ बोज्यू चप्पल कै ल्याछा यस…’, ‘ओ भिना कसिके जानूं द्वारहाटा…,’ ‘धारमक लालमणि दै खै जा पात मा…।’हिलमा चांदी कु बटना,सौली घुरा घुर दगिद्या, जरा ठंडो चला दे, सैट समोदर पार, चैता की चैत्वाल,दूर बटी कुद्ग्याली न लगा, और भी बहुत सारे गीत थे। ‘न्यौली’, ‘छपेली’, ‘बाजूबंद’, झोड़े-झुमेलो’, ‘भगनोल’, ‘ऋतुरैण’ आदि जिन्होंने हमें लोकगीतों की एक समझ दी।

इन गीतों में हमारा पूरा समाज चलता है। इन गीतों से हमने एक-दूसरे के दर्द भी जाने और दर्द के साथ जीना भी सीखा। कितनी सारी अन्तर्कथायें हैं इन गीतों के भीतर। हमारी अन्तर्कथायें। लोक की, लोक में रहने वाले समाज की। सबकी सामूहिक। व्यक्तिगत तो हो ही नहीं सकती। होती तो यह आवाज लोक से नहीं निकलती। जंगल के एकान्त से निकलने वाली ‘न्यौली’ हो या गांव से निकलने वाला ‘भगनौला’, सामूहिकता में पिरोई ‘झौड़े-झुमैलो’ की रंगत हो या ‘खुदेड़ गीत’, हमारे पारंपरिक ‘ऋतुगीत’ हों या ‘मांगलगीत’, पांडव गीत-नृत्यों से लेकर ‘रम्माण’ तक, घस्यारी के गीतों से लेकर बद्दी गीत, थड़िया, चैंफला, चांचरी, बाजूबंद, छूड़ा, जागर, लोक गाथाओं तक।

राही जी लोकवाद्य ढोल, नगाड़ा, बांसुरी, जौल्यां-मुरली, नागफनी, रणसिंगा, डफली, हुड़का, शंख, घंट, इकतारा, दोतारा, सारंगी, बिणाई, खंजरी, तुरही, भंकोरा, डौंर, थाली, डमरू, अलगोजा, मशकबीन, घुंघरू, खड़ताल, घानी, चिमटा, मजीरा, कंसेरी, झांझ तक लोक विधाओं के धनी थे l

10 जनवरी 2016 को पहाड़ का ये सपूत हम सभी को छोड़कर चला गया था। चन्द्र सिंह राही जी के परिवार में उनके चार पुत्र हैं जो कि उनकी विधा को आगे पढ़ा रहे हैं l

    0

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    Uttarakhand Cinema